जानाम आयोय रेंगेज रेहं, उनी गेय हाःरा-हा, जानाम रड़दो निधान रेहं अना तेगे मारांग्-आ : राष्ट्रपति
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, राज्यपाल संतोष गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जमशेदपुर में ओल चिकी के शताब्दी समारोह के समापन समारोह में हिस्सा लिया।

जमशेदपुर | करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान प्रांगण में आयोजित ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन और दिशोम जाहेरथान कमेटी के 22वें संताली परसी माहा एवं ओलचिकी शताब्दी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली में अपना संबोधन दिया। यहां उन्होंने कहा कि यहां आने से पहले जाहेर आयो को जोहार कर पंडित रघुनाथ मुर्मू को श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि भारत में अनेक जनजातीय समुदाय हैं जिनमें संताल भी शामिल हैं। संताल समुदाय के लोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और मॉरीशस में भी निवास करते है। संतालों की अपनी प्राचीन भाषा, साहित्य और संस्कृति है। लेकिन एक शताब्दी पहले, संताली भाषा की अपनी लिपि नहीं होने के कारण रोमन, देवनागरी, ओड़िआ और बांग्ला आदि लिपियों का उपयोग किया जाता था। इन लिपियों में संताली भाषा के अनेक शब्दों का उच्चारण सही रूप से नहीं हो पा रहा था।

हिंदी, अंग्रेजी, ओड़िआ, बांग्ला आदि भाषाओं में बच्चे पढ़ाई करते हैं, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन, साथ-साथ अपनी मातृभाषा संताली को अलचिकि लिपि में सीखना बच्चों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रपति ने कहा कि देश के 75 पीवीटी ट्राइबल (पर्टिक्यूलरली वुलरेनेबल ट्राइबल ग्रुप) अभी भी पेड़ में रहते हैं, उनके घर नहीं हैं। उनके कपड़े नहीं हैं और हम लोग अमृत वर्ष माना रहे हैं। आख़िरकार सरकार ने बात सुनी और बिरहोर समेत सभी आदिवासी के लिए 24 हज़ार करोड़ से उनके विकास को काम करने का मिशन शुरू किया। उन्होंने कहा कि ये आदिवासी नहीं जानते कि पीएम आवास बन रहे है, ये लोग यह भी नहीं जानते कि सीमेंट कहाँ से आएगा, घर कैसे बनेगा इसलिए उन्हें घर बनाकर देना होगा। राष्ट्रपति ने कहा मेरे लोग (आदिवासी) अभी भी बच्चे हैं। इन्हें पैसे का इस्तेमाल करना नहीं आता। इसलिए उन्हें पैसे नहीं दें, इन्हें घर बनाकर दें।

संताली राइटर्स के योगदान पर बोलीं
राष्ट्रपति ने संताली राइटर्स के योगदान पर कहा कि आदिवासियों के स्वाभिमान और अस्तित्व रक्षा के लिए इनका योगदान अभूतपूर्व है। अपने दैनिक जीवन से समय निकाल कर ये भाई बहन ओलचिकी के लिए काम कर रहे है। उन्होंने कहा कि रघुनाथ मुर्मू के काम को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने संविधान के संताली अनुवाद पर कहा कि अटल बिहारी बाजपेयी के 100 साल पर ओलचिकी में संविधान का प्रकाशन किया गया। यह कार्य भी संताली समाज को सशक्त करने की दिशा में एक कदम है। किसी लिपि का शताब्दी वर्ष समारोह आयोजित करना एक अत्यंत ऐतिहासिक अवसर है। यह बहुत ही गर्व और हर्ष का विषय है कि देश-विदेश के अनेक क्षेत्रों में, विभिन्न संगठनों द्वारा ये समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। मुझे बताया गया है कि ओड़िशा सरकार द्वारा भी अलचिकि के शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन किया गया है।
इन्हें मिला सम्मान
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संताली साहित्यकारों और ओलचिकी को समृद्ध बनाने वालों को सम्मानित किया गया इसमें शोभनाथ बेसरा (गुरु गोमके के साथ काम कर चुके), पद्मश्री डॉ दमयंती बेसरा, मुचीराम हेम्ब्रॉम, भीमवार मुर्मू ( रघुनाथ मुर्मू के पोते), साखी मुर्मू (शिक्षक), रामदास मुर्मू (संताली लाइब्रेरियन), चुंडा सोरेन सिपाही (लेखक), छोतराय बास्के (ओलचिकी शिक्षक), निरंजन हंसदा (साहित्यकार), बीबी सुंदरमन एवं सौरव (टीएसएफ), शिव शंकर कंडेयांग ( ओलचिकी सेंटर चलाने वाले), सीआर माझी (रघुनाथ मुर्मू एकेडमी के सेंटर संचालक), को सम्मानित किया गया.



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